Tuesday, November 3, 2015

छू रही है उनको एहसास से, हर गजल मेरी। 
देख लेती है खुद को नाज से, हर गजल मेरी।। 

उतरो कभी तुम तह में, ऐ साकी -ए -मयखाना।। 
बुनी है शबनम -ओ -शराब से, हर गजल मेरी।। 

न लैला से न हीर से, न ताज से लिखी है। 
लिखी है "एक जिन्दा मुमताज" से हर गजल मेरी।। 

वो ख्वाब क्या जो ख्वाब से बस ख्वाब रह जाये। 
बेहतर है "अश्क " उस ख्वाब से हर गजल मेरी।।

Saturday, October 31, 2015



इक शम्मा की लव पर जलते हैं , परवाने हज़ार। 
मिलता नहीं है फ़िर भी, दिल को कुछ क़रार।

माना की लौट कर ना, आओगे अब कभी। 
मिटने की आरज़ू फ़िर भी है, तेरे कूचे में ए यार।

जब कभी भी याद तुम, आओगे दिल को। 
सहला लिया करेँगे, ये ज़ख्म बेशुमार।

कभी शराब पीकर भी, तेरा ज़िक्र ना करेँगे। 
जितना भी चाहे दिल पर, छाएगा यूँ ख़ुमार।

तुम जफ़ा किये हम वफ़ा किये, इसी में उम्र गुज़री,
अच्छा तो अश्क़ ख़ुदा हाफ़िज, हम तो चले मज़ार।
 
हम  क़िस्मत  के,  मारे  हैं।
जीती  बाज़ी,  हारे  हैं।।

ग़म  क्योँ  देते  हैं,  वो  ही।
आँखों  के  जो,  तारे  हैं।।

प्यास  बुझे  भी,  कैसे  मेरी।
आँसू  भी  तो,  खारे  हैं।।

क़ातिल  हूँ  मैं  भी,  क़ादिर।
हमने  अरमां  मारे   हैं।।

Sunday, July 5, 2015

दूर रखना मग़र, दूरी मत रखना।
वफ़ा के खेल में,मज़बूरी मत रखना।।

ये ख़्वाहिशों का शहर है,संभल कर चलना।
तिल रखना, चेहरा फ़क़त सिंदूरी मत रखना।।

नसीब मैं है तो वो,चलकर आएगा।
धंधे में घाटा रखना,जी -हुजीरी  मत रखना।।

वक़्तके साथ चलना,गर उरूज पे जाना हो।
अंगरेजी ज़बान रखना, हिन्दी की फ़क़ीरी मत रखना।।

सुना है शहर में उसके,चर्चे बहुत हैं "अश्क़"।
कहता था चेहरा ग़ुलाब रखना अंगूरी मत रखना।।
हम जिनके लिए हर रोज़ , मुक़द्दर आज़माते रहे।
हाथ में पत्थर लिए वो, मेरा सर आज़माते रहे।।

इक उम्र हुई खुले हुए, दरवाज़े मेरे दिल के।
वो महफ़िलें आजमाया, हम घर आजमाते रहे।।

सीने में लहू है, मेरी आँखों में है समन्दर।
वो तीर आजमाता रहा, हम जिग़र आज़माते रहे।।

सुना है वो किसी और की, वज्म -ए -रौनक़ हैं।
बेवज़ह इक उम्र से, हम सफ़र आज़माते रहे।।

अब जाकर क़ब्र में, चैन आया हैं "अश्क"।
जिन्दगी भर उन्हें पाने का, हुनर आज़माते रहे।। 
जब से वो इस दिल से, दूर हो गया है।
सुना है वो बड़ा, मशहूर हो गया है।।

आँखों को सजा देता हूँ, दिलों के गुनाह को।
ये गुनाह एक उम्र से, भरपूर हो गया है।।

ये एहसान कर चल, मौत की दुआ कर।
जिन्दगी तेरा सितम अब, भरपूर हो गया है।।

हाथ छोड़ दिया उसने, हाथों में रखकर।
उसकी कहानी में कुछ नया, ज़रूर हो गया है।।

मेरा नशीब था मुझसे, दूर जाने वाला "अश्क़ "।
औरों से सुना है वो, बहुत मजबूर हो गया है।। 

Sunday, June 28, 2015

आईने कुछ तो मेरी, तरफ़दारी ऱख।
मैं बीमार हूँ, चल मेरी बीमारी ऱख।।

वो चला गया जिस पर, तुझे गुरूर था कभी।
अब मेरे चेहरे की फ़क़त, तलबग़ारी ऱख।।

बरसों से बरस रही हैं, बे-मौशम मेरी आँखें।
बारिश में बरस, कुछ तो पर्दादारी ऱख।।

वो चाँद अब, किसी और शहर गया।
रोज़ा कैसे तोड़ेंगे, चल अपनी इफ़्फ़तियारी ऱख।।

ये हयात जब किसी की, अमानत ना रही।
"अश्क़" अब फ़क़त, मौत की तैयारी ऱख।।  
हां वो शख़्स, आज़ भी मेरा है।।
एक साँस के सिवा, कौन दूसरा है।।

तेरी बेरुख़ी एक, ज़ुर्म ही सही।
तेरी यादों का मुझपर, आज़ भी पहरा है।।

मौत से कह दो, दुश्मनी तोड़ दे मुझसे।
जिंदगी से रिश्ता ही अब जरा जरा है।।

समंदरों को भी हुनर चाहिए, डुबाने का।
जिस कश्ती पर, लहरों का पहरा है।।

मौत से कहना मेरा, इलाज़ ढूंढे "अश्क़"।
इस जिन्दगी का हर ज़ख्म, अब भी हरा है।। 
जिन्दगी मुझ पर, इतना रहम कर दे।
मेरी साँसे, मेरी दुश्मन कर दे।

महँगी हो गई हैं दवाएं भी, इस दौर में।
कोई फिर से दुआओं का, मौसम कर दे।।

थक गया तेरे सितम से, ए ग़म-ए-हयात।
ये जवानी मेरी, फिर से बचपन कर दे।।

तू मेरे दर्द में शामिल रहे, ता-उम्र।
मेरे सीने में कुछ ऐसा, जख़्म कर दे।।

वादा कर ए काफ़िर, मेरी क़ब्र पे आने का।
मेरे जीने का कुछ तो, भरम कर दे।।

मैं सजू सवरूं हर रोज़, उसे देखकर "अश्क़ "।
मेरे घर का आइना कोई, 'सनम' कर दे।


हम उसके दिल में, अपना मक़ाम खोजते रहे।
मेरी तवाहियों का जो, सामान खोजते रहे।।

हम बारिशों में भी बरसे, बादलों का क्या कुशूर।
लोग मेरे आँशुओं का, निशान खोजते रहे।।

वो गया तो खुशबुओं को, समेटकर ले गया।
हम शहर भर फूलों की,  दुकान खोजते रहे।।

समन्दर से कह गया, अपनी हद में रहो।
कल तलक जो किनारों पे,  मक़ाम खोजते रहे।।

मेंहदी सने हाथोँ को,  मासूमियत से दिखाया।
"अश्क" उम्र  भर जिसमे हम अपना, नाम खोजते रहे।।

Wednesday, June 3, 2015

यादें तू अपनी ख़्वाहिशों का, पयमाना तय कर।
वक़्त -ए -क़ज़ा पे आने का, बहाना तय कर।।

जिंदगी अब जियी जाती नहीं, तेरे बगैर।
एक बार आकर अपना, आना-जाना तय कर।।

मुद्दतोँ से होंठो में, रेत लिए बैठा हूँ।
अपनी जुल्फ़ों को एक, बार गिराना तय कर।।

दरवाज़े मेरे घर के, दीवार बन चुके है।
तू अपनी बेरुख़ी का कुछ तो, फ़साना तय कर।।

झूठा ही वादा कर एक बाऱ, आने का "अश्क़"।
या ग़म-ए -हयात का, "मौत" हरजाना तय कर।।




ज़ख्मो के हिसाब अब, हम नहीं रखते।
वक़्त के सफ़ीने भी जब, मरहम नहीं रखते।।

देखकर कोई इनको, बादल समझ बैठेगा।
जुल्फ़ों को यूँ, बरहम नहीं रखते ।।

दुश्मनी निबाहोगे लाख, हम दोस्त ही रहेंगे।
उनसे कहना कि हम, दुश्मन नहीं रखते ।।

ख़ंजर चलाना है तो मेरे, सीने में उतार दे।
तेरे लिए दिल रखते हैं, जहन नहीं रखते ।।

मुझे डुबाने की, ज़िद न कर समन्दर।
"अश्क"हम रूह रखते हैं, बदन नहीं रखते ।।

Sunday, May 17, 2015

ज़िन्दगी अपने हिस्से की, जी लिया हमने।
यही  सोचकर आज फिर, पी लिया हमने।।

मौज़ू -ए- क़ज़ा  को, कोई  समझ ना सके।
होंठों को अपने इसलिए, सी लिया हमने।।

हर पत्थर को गुरूर था, खुदा होने का।
आबगीनो को, हारकर चुन लिया हमने।।

टूट कर चाहा जिसे, हर साँस के साथ।
मेरी वफ़ाओं को उँगलियों पर, गिन लिया उसने।।

हर शय को पता था, जिंदगी की बेवफ़ाई का।
वफ़ा-ए-क़ज़ा का "अश्क़" यूँ ही नहीं, दिल लिया हमने।।