यादें तू अपनी ख़्वाहिशों का, पयमाना तय कर।
वक़्त -ए -क़ज़ा पे आने का, बहाना तय कर।।
जिंदगी अब जियी जाती नहीं, तेरे बगैर।
एक बार आकर अपना, आना-जाना तय कर।।
मुद्दतोँ से होंठो में, रेत लिए बैठा हूँ।
अपनी जुल्फ़ों को एक, बार गिराना तय कर।।
दरवाज़े मेरे घर के, दीवार बन चुके है।
तू अपनी बेरुख़ी का कुछ तो, फ़साना तय कर।।
झूठा ही वादा कर एक बाऱ, आने का "अश्क़"।
या ग़म-ए -हयात का, "मौत" हरजाना तय कर।।
वक़्त -ए -क़ज़ा पे आने का, बहाना तय कर।।
जिंदगी अब जियी जाती नहीं, तेरे बगैर।
एक बार आकर अपना, आना-जाना तय कर।।
मुद्दतोँ से होंठो में, रेत लिए बैठा हूँ।
अपनी जुल्फ़ों को एक, बार गिराना तय कर।।
दरवाज़े मेरे घर के, दीवार बन चुके है।
तू अपनी बेरुख़ी का कुछ तो, फ़साना तय कर।।
झूठा ही वादा कर एक बाऱ, आने का "अश्क़"।
या ग़म-ए -हयात का, "मौत" हरजाना तय कर।।
Pleased to read ghazals. Very nice
ReplyDeleteNice
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