Tuesday, January 12, 2016

दफ़न रहे ता -उम्र नाम, मेरे जिग़र के वास्ते।
माँगी है ये दुआ हमने, उस सितमगर के वास्ते।।

मयस्सर ना थी मयक़शी, महफ़िल में मेरे लिए।
शौक़ से फ़िर भी पीयी, हमने नज़र के वास्ते।।

फ़सल -ए - ग़ुल के दौर में, बदगुमाँ थी वो कली।
देखे थे क्या - क्या ख़्वाब, उसने समर के वास्ते।।

ज़ुर्म बस मुहब्बत था, करता है जिसे ज़माना।
बदनाम थी वो गली, उस गुहर के वास्ते।।

हाल तक पूछा नहीं, गर्दिशों के दौर में भी।
जिनपर यकीं था "अश्क़" मुझको, हमसफ़र के वास्ते।।