आंसुओं की क़लम से, जज़्बात लिख़ रहा हूँ।
राज़ -ए -उल्फ़त की मैं, क़िताब लिख़ रहा हूँ।।
दिल ने चाहा था क्या, दिल ने पाया है क्या।
मिली जितनी भी उनसे, सौगात लिख़ रहा हूँ।।
जाने क्या रश्क़ है, नूर से भी मुझको।
शफ़क़ को भी, शियह रात लिख़ रहा हूँ।।
जहन में कुछ और बात, आती नहीं दोस्त।
उनवान इस कहानी का, फ़िराक लिख़ रहा हूँ।।
हसरतेँ तो इतनी हैं कि, शुमार नहीं कर सकते।
फ़िर भी हर हसरत को, ख़ास लिख़ रहा हूँ।।
"अश्क़" लिखता नहीं हूँ, फ़िर भी मग़र।
आँखों से दिल के, हालात लिख़ रहा हूँ।।
राज़ -ए -उल्फ़त की मैं, क़िताब लिख़ रहा हूँ।।
दिल ने चाहा था क्या, दिल ने पाया है क्या।
मिली जितनी भी उनसे, सौगात लिख़ रहा हूँ।।
जाने क्या रश्क़ है, नूर से भी मुझको।
शफ़क़ को भी, शियह रात लिख़ रहा हूँ।।
जहन में कुछ और बात, आती नहीं दोस्त।
उनवान इस कहानी का, फ़िराक लिख़ रहा हूँ।।
हसरतेँ तो इतनी हैं कि, शुमार नहीं कर सकते।
फ़िर भी हर हसरत को, ख़ास लिख़ रहा हूँ।।
"अश्क़" लिखता नहीं हूँ, फ़िर भी मग़र।
आँखों से दिल के, हालात लिख़ रहा हूँ।।