Tuesday, November 3, 2015

छू रही है उनको एहसास से, हर गजल मेरी। 
देख लेती है खुद को नाज से, हर गजल मेरी।। 

उतरो कभी तुम तह में, ऐ साकी -ए -मयखाना।। 
बुनी है शबनम -ओ -शराब से, हर गजल मेरी।। 

न लैला से न हीर से, न ताज से लिखी है। 
लिखी है "एक जिन्दा मुमताज" से हर गजल मेरी।। 

वो ख्वाब क्या जो ख्वाब से बस ख्वाब रह जाये। 
बेहतर है "अश्क " उस ख्वाब से हर गजल मेरी।।