Sunday, July 5, 2015

दूर रखना मग़र, दूरी मत रखना।
वफ़ा के खेल में,मज़बूरी मत रखना।।

ये ख़्वाहिशों का शहर है,संभल कर चलना।
तिल रखना, चेहरा फ़क़त सिंदूरी मत रखना।।

नसीब मैं है तो वो,चलकर आएगा।
धंधे में घाटा रखना,जी -हुजीरी  मत रखना।।

वक़्तके साथ चलना,गर उरूज पे जाना हो।
अंगरेजी ज़बान रखना, हिन्दी की फ़क़ीरी मत रखना।।

सुना है शहर में उसके,चर्चे बहुत हैं "अश्क़"।
कहता था चेहरा ग़ुलाब रखना अंगूरी मत रखना।।
हम जिनके लिए हर रोज़ , मुक़द्दर आज़माते रहे।
हाथ में पत्थर लिए वो, मेरा सर आज़माते रहे।।

इक उम्र हुई खुले हुए, दरवाज़े मेरे दिल के।
वो महफ़िलें आजमाया, हम घर आजमाते रहे।।

सीने में लहू है, मेरी आँखों में है समन्दर।
वो तीर आजमाता रहा, हम जिग़र आज़माते रहे।।

सुना है वो किसी और की, वज्म -ए -रौनक़ हैं।
बेवज़ह इक उम्र से, हम सफ़र आज़माते रहे।।

अब जाकर क़ब्र में, चैन आया हैं "अश्क"।
जिन्दगी भर उन्हें पाने का, हुनर आज़माते रहे।। 
जब से वो इस दिल से, दूर हो गया है।
सुना है वो बड़ा, मशहूर हो गया है।।

आँखों को सजा देता हूँ, दिलों के गुनाह को।
ये गुनाह एक उम्र से, भरपूर हो गया है।।

ये एहसान कर चल, मौत की दुआ कर।
जिन्दगी तेरा सितम अब, भरपूर हो गया है।।

हाथ छोड़ दिया उसने, हाथों में रखकर।
उसकी कहानी में कुछ नया, ज़रूर हो गया है।।

मेरा नशीब था मुझसे, दूर जाने वाला "अश्क़ "।
औरों से सुना है वो, बहुत मजबूर हो गया है।।