हम जिनके लिए हर रोज़ , मुक़द्दर आज़माते रहे।
हाथ में पत्थर लिए वो, मेरा सर आज़माते रहे।।
इक उम्र हुई खुले हुए, दरवाज़े मेरे दिल के।
वो महफ़िलें आजमाया, हम घर आजमाते रहे।।
सीने में लहू है, मेरी आँखों में है समन्दर।
वो तीर आजमाता रहा, हम जिग़र आज़माते रहे।।
सुना है वो किसी और की, वज्म -ए -रौनक़ हैं।
बेवज़ह इक उम्र से, हम सफ़र आज़माते रहे।।
अब जाकर क़ब्र में, चैन आया हैं "अश्क"।
जिन्दगी भर उन्हें पाने का, हुनर आज़माते रहे।।
हाथ में पत्थर लिए वो, मेरा सर आज़माते रहे।।
इक उम्र हुई खुले हुए, दरवाज़े मेरे दिल के।
वो महफ़िलें आजमाया, हम घर आजमाते रहे।।
सीने में लहू है, मेरी आँखों में है समन्दर।
वो तीर आजमाता रहा, हम जिग़र आज़माते रहे।।
सुना है वो किसी और की, वज्म -ए -रौनक़ हैं।
बेवज़ह इक उम्र से, हम सफ़र आज़माते रहे।।
अब जाकर क़ब्र में, चैन आया हैं "अश्क"।
जिन्दगी भर उन्हें पाने का, हुनर आज़माते रहे।।
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