Saturday, October 26, 2013


कीदत की दीवारों में वो बात नहीं। 
दिवाली के दिए की अवकात नहीं।।

तीर -ऐ -नजर यूँ है जुदा उसका। 
हबा -ऐ -शुरूर में भी परवाज नहीं।।

ब भी करे सवाल तो सजदा किये हुए। 
माहो -अंजुम में ऐसा महताब नहीं।।

हतियातन हर कोई दीदार करता है। 
शेरो -नज्म की जहाँ में किताब नहीं।।

कीरें जबीं की नाजों में बढ़ी होंगी। 
"अश्क " किसी किस्मत की वो मोहताज नहीं।।

Monday, October 21, 2013

छू रही है उनको एहसास से, हर गजल मेरी।
देख लेती है खुद को नाज से, हर गजल मेरी।।

उतरो कभी तुम तह में, ऐ साकी -ए -मयखाना।।
बुनी है शबनम -ओ -शराब से, हर गजल मेरी।।

न लैला से न हीर से, न ताज से लिखी है।
लिखी है एक जिन्दा मुमताज से हर गजल मेरी।।

वो ख्वाब क्या जो ख्वाब से बस ख्वाब रह जाये।
बेहतर है "अश्क " उस ख्वाब से हर गजल मेरी।।