इक शम्मा की लव पर जलते हैं , परवाने हज़ार।
मिलता नहीं है फ़िर भी, दिल को कुछ क़रार।।
माना की लौट कर ना, आओगे अब कभी।
मिटने की आरज़ू फ़िर भी है, तेरे कूचे में ए यार।।
जब कभी भी याद तुम, आओगे दिल को।
सहला लिया करेँगे, ये ज़ख्म बेशुमार।।
कभी शराब पीकर भी, तेरा ज़िक्र ना करेँगे।
जितना भी चाहे दिल पर, छाएगा यूँ ख़ुमार।।
तुम जफ़ा किये हम वफ़ा किये, इसी में उम्र गुज़री,
अच्छा तो “अश्क़” ख़ुदा हाफ़िज, हम तो चले मज़ार।।