हम क़िस्मत के, मारे हैं।
जीती बाज़ी, हारे हैं।।
ग़म क्योँ देते हैं, वो ही।
आँखों के जो, तारे हैं।।
प्यास बुझे भी, कैसे मेरी।
आँसू भी तो, खारे हैं।।
क़ातिल हूँ मैं भी, क़ादिर।
हमने अरमां मारे हैं।।
जीती बाज़ी, हारे हैं।।
ग़म क्योँ देते हैं, वो ही।
आँखों के जो, तारे हैं।।
प्यास बुझे भी, कैसे मेरी।
आँसू भी तो, खारे हैं।।
क़ातिल हूँ मैं भी, क़ादिर।
हमने अरमां मारे हैं।।
nice
ReplyDeleteGood
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