Sunday, June 28, 2015

आईने कुछ तो मेरी, तरफ़दारी ऱख।
मैं बीमार हूँ, चल मेरी बीमारी ऱख।।

वो चला गया जिस पर, तुझे गुरूर था कभी।
अब मेरे चेहरे की फ़क़त, तलबग़ारी ऱख।।

बरसों से बरस रही हैं, बे-मौशम मेरी आँखें।
बारिश में बरस, कुछ तो पर्दादारी ऱख।।

वो चाँद अब, किसी और शहर गया।
रोज़ा कैसे तोड़ेंगे, चल अपनी इफ़्फ़तियारी ऱख।।

ये हयात जब किसी की, अमानत ना रही।
"अश्क़" अब फ़क़त, मौत की तैयारी ऱख।।  
हां वो शख़्स, आज़ भी मेरा है।।
एक साँस के सिवा, कौन दूसरा है।।

तेरी बेरुख़ी एक, ज़ुर्म ही सही।
तेरी यादों का मुझपर, आज़ भी पहरा है।।

मौत से कह दो, दुश्मनी तोड़ दे मुझसे।
जिंदगी से रिश्ता ही अब जरा जरा है।।

समंदरों को भी हुनर चाहिए, डुबाने का।
जिस कश्ती पर, लहरों का पहरा है।।

मौत से कहना मेरा, इलाज़ ढूंढे "अश्क़"।
इस जिन्दगी का हर ज़ख्म, अब भी हरा है।। 
जिन्दगी मुझ पर, इतना रहम कर दे।
मेरी साँसे, मेरी दुश्मन कर दे।

महँगी हो गई हैं दवाएं भी, इस दौर में।
कोई फिर से दुआओं का, मौसम कर दे।।

थक गया तेरे सितम से, ए ग़म-ए-हयात।
ये जवानी मेरी, फिर से बचपन कर दे।।

तू मेरे दर्द में शामिल रहे, ता-उम्र।
मेरे सीने में कुछ ऐसा, जख़्म कर दे।।

वादा कर ए काफ़िर, मेरी क़ब्र पे आने का।
मेरे जीने का कुछ तो, भरम कर दे।।

मैं सजू सवरूं हर रोज़, उसे देखकर "अश्क़ "।
मेरे घर का आइना कोई, 'सनम' कर दे।


हम उसके दिल में, अपना मक़ाम खोजते रहे।
मेरी तवाहियों का जो, सामान खोजते रहे।।

हम बारिशों में भी बरसे, बादलों का क्या कुशूर।
लोग मेरे आँशुओं का, निशान खोजते रहे।।

वो गया तो खुशबुओं को, समेटकर ले गया।
हम शहर भर फूलों की,  दुकान खोजते रहे।।

समन्दर से कह गया, अपनी हद में रहो।
कल तलक जो किनारों पे,  मक़ाम खोजते रहे।।

मेंहदी सने हाथोँ को,  मासूमियत से दिखाया।
"अश्क" उम्र  भर जिसमे हम अपना, नाम खोजते रहे।।