Sunday, July 10, 2016

आंसुओं की क़लम से, जज़्बात लिख़ रहा हूँ।
राज़ -ए -उल्फ़त की मैं, क़िताब लिख़ रहा हूँ।।

दिल ने चाहा था क्या, दिल ने पाया है क्या।
मिली जितनी भी उनसे, सौगात लिख़ रहा हूँ।।

जाने क्या रश्क़ है, नूर से भी मुझको।
शफ़क़ को भी, शियह रात लिख़ रहा हूँ।।

जहन में कुछ और बात, आती नहीं दोस्त।
उनवान इस कहानी का, फ़िराक लिख़ रहा हूँ।।

हसरतेँ तो इतनी हैं कि, शुमार नहीं कर सकते।
फ़िर भी हर हसरत को, ख़ास लिख़ रहा हूँ।।

"अश्क़" लिखता नहीं हूँ, फ़िर भी मग़र।
आँखों से दिल के, हालात लिख़ रहा हूँ।।

Thursday, February 11, 2016

वो तिलिस्म था कि, जुदा क़ोई अंन्दाज था।
आईना ख़रीद रहे थे, चेहरे पे नक़ाब था।।

होश लुटा बैठे, जब  ये बताया किसी ने।
वो शहर का, इकलौता ग़ुलाब था।।

आज़ फ़िर शैलाब आया, इन आँखों के रस्ते।
शहर वालों ने समझा कि, मौसम ख़राब था।।

फूल, ख़ुशबू, हवा, साँसे, रिश्ते सब कुछ।
जिन्दगी समझा जिसे , वो इक हबाब था।।

जब तलक वो  साथ था, वक़्त भी ठहरा रहा।
बदले हुए इस दौर में, वो दौर -ए -इन्क़लाब था।।

उसने वही पढ़ा, जो चेहरे पे देखा।
मेरा क़िरदार "अश्क " खुलुश-ए-क़िताब था।।

Saturday, February 6, 2016

तलाश -ए -सुकूँ में, सहर हो गई।
रफ़्ता - रफ़्ता यूँ ही, उमर हो गई।।

जुगनुओं अब तुम्हीं , कर दो रौशन शमा।
वो ग़ैरों की, वज्म -ए -क़मर हो गई।।

मेरी माँ से कहना, हवाओं यहाँ।।
दुआ दोस्तों की, बे-असर हो गई।।

शहर की हवा अब, बड़ी बे-वफ़ा है।
तेरे आँचल की फिर से, नज़र हो गई।।

मैं जिंन्दा हूँ या मैं, जिये जा रहा हूँ।
मौत भी मुझसे अब , बेख़बर हो गई।।

यादें  सहम कर, दम तोड़ती हैं।
ज़िंदगी "अश्क़" शायद, बसर हो गई।।

Friday, January 22, 2016

दुनियाँ रह गई, अपने चले गये।
मौज़ में बहते, सपनें चले गये।।

रखा था जिसे मैं, सीने से लगाकर।
मेरे ज़िस्म के वो, गहने चले गये।।

क़ज़ा कितनी हसींन थी, हयात के ग़मों से।
यही बात वो ख़ुदा से, कहने चले गये।।

जिस गली में जाने से, हिचकते हैं लोग।
बड़े बेबाक़ क़फ़न को, पहने चले गए।।

तुम तो ख़ैर वाकिफ़ थे, इन ग़मों से "अश्क़"।
फ़िर भी आँशुओँ में, सने चले गये।।

Tuesday, January 12, 2016

दफ़न रहे ता -उम्र नाम, मेरे जिग़र के वास्ते।
माँगी है ये दुआ हमने, उस सितमगर के वास्ते।।

मयस्सर ना थी मयक़शी, महफ़िल में मेरे लिए।
शौक़ से फ़िर भी पीयी, हमने नज़र के वास्ते।।

फ़सल -ए - ग़ुल के दौर में, बदगुमाँ थी वो कली।
देखे थे क्या - क्या ख़्वाब, उसने समर के वास्ते।।

ज़ुर्म बस मुहब्बत था, करता है जिसे ज़माना।
बदनाम थी वो गली, उस गुहर के वास्ते।।

हाल तक पूछा नहीं, गर्दिशों के दौर में भी।
जिनपर यकीं था "अश्क़" मुझको, हमसफ़र के वास्ते।।

Thursday, January 7, 2016

आसमां से पूँछ लो, सितारों से पूछ लो।
सरहदों पे शहीद, वतनगारों से पूछ लो।।

मक़सद हमारा अमन, तब भी था अब भी है।
लहू से सनी कश्मीर की, बहारों से पूछ लो।

जाने कितनी जग़ह, उनके सीनों में है।
भरता नहीं वो दिल, ज़ख्म के मारों से पूछ लो।

सुकूं ही सुकूं था, जब एक थे दोनों।
कितना चैन मिला है, दो बटवारोँ से पूछ लो।

आबरू है लुटा, कितनी मांगें हैं उजड़ी।
बिलखती बहनों के बिखरे, सिँगारो से पूछ लो।

अन्जाम - ए - सिनसाई, ग़र यही है "अश्क़ "
क्या कहते हैं हाथोँ में सजे, हथियारोँ से पूछ लो।