Sunday, May 18, 2014

मुझे शिक़वा नहीं, उसकी बेवफ़ाई पर।
हाँ ग़म है ज़रूर थोड़ा, जुदाई पर।।

वो तो किसी और की, अमानत थे ऐे दिल।
इल्ज़ाम मत लगा यूँ, शहनाई पर।।

मुबारक़ हो उन्हें, वज्म -ए -रंगी का हुनर।
छोड़ दें मुझको, मेरी तन्हाई पर।।

उन्हे कुछ दे नहीं सकता, सिवाय जां के।
क्या करुँ ये जेब मेरी, तंग है मंहगाई पर।।

कैद हो गई जो परबाज की, दीवानी थी 'अश्क'।
उस सैयाद की नाजुक, सिनसाई पर।।
 
ना दिन से परेशां हूँ, ना रात से परेशां हूँ।
आजकल मैं, अपने आप से परेशां हूँ।।

जो कहा था उसने कभी, ख़्वाब में मुझसे।
आजकल मैं उसकी, इसी बात से परेशां हूँ।।

मेरा बस चले तो, सितारे तोड़ कर दे दूँ।
मगर दोस्तों मैं अपनी, अवक़ात से परेशां हूँ।।

हम कच्चे मकान वाले, हर मिज़ाज से वाकिफ़ हैं।
उनको भरम है, मैं बरसात से परेशां हूँ।।

जिंदगी भी हिज्र के, आँचल  में सिमटी 'अश्क'।
टूटती नहीं कमज़र्फ इस, सांस से परेशां हूँ।।