ना दिन से परेशां हूँ, ना रात से परेशां हूँ।
आजकल मैं, अपने आप से परेशां हूँ।।
जो कहा था उसने कभी, ख़्वाब में मुझसे।
आजकल मैं उसकी, इसी बात से परेशां हूँ।।
मेरा बस चले तो, सितारे तोड़ कर दे दूँ।
मगर दोस्तों मैं अपनी, अवक़ात से परेशां हूँ।।
हम कच्चे मकान वाले, हर मिज़ाज से वाकिफ़ हैं।
उनको भरम है, मैं बरसात से परेशां हूँ।।
जिंदगी भी हिज्र के, आँचल में सिमटी 'अश्क'।
टूटती नहीं कमज़र्फ इस, सांस से परेशां हूँ।।
आजकल मैं, अपने आप से परेशां हूँ।।
जो कहा था उसने कभी, ख़्वाब में मुझसे।
आजकल मैं उसकी, इसी बात से परेशां हूँ।।
मेरा बस चले तो, सितारे तोड़ कर दे दूँ।
मगर दोस्तों मैं अपनी, अवक़ात से परेशां हूँ।।
हम कच्चे मकान वाले, हर मिज़ाज से वाकिफ़ हैं।
उनको भरम है, मैं बरसात से परेशां हूँ।।
जिंदगी भी हिज्र के, आँचल में सिमटी 'अश्क'।
टूटती नहीं कमज़र्फ इस, सांस से परेशां हूँ।।
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