ज़बान पे तल्ख़ी हाथ में, पत्थर रखते हैं।
उनके पहलू में हम जब भी, सर रखते हैं।।
जाने कब याद उनकी, दिल को रुला जाये।
आँखों को इसलिए आंसुओ से, तर रखते हैं।।
ढूढे नहीं मिला वो, हुजूम -ऐ -दहर में मुझको।
लोगों की नज़र में, हम भी नज़र रखते हैं।।
कितना ख़ुशनसीब होगा, जो करीब है उनके।
सुना है वो गेसुओं में, कौशर रखते हैं।।
सुनता नहीं है आह कोई, इस दिल कि "अश्क़।
कैसे यकीं दिलाऊं कि हम भी, दाग -ऐ -जिग़र रखते हैं।।
उनके पहलू में हम जब भी, सर रखते हैं।।
जाने कब याद उनकी, दिल को रुला जाये।
आँखों को इसलिए आंसुओ से, तर रखते हैं।।
ढूढे नहीं मिला वो, हुजूम -ऐ -दहर में मुझको।
लोगों की नज़र में, हम भी नज़र रखते हैं।।
कितना ख़ुशनसीब होगा, जो करीब है उनके।
सुना है वो गेसुओं में, कौशर रखते हैं।।
सुनता नहीं है आह कोई, इस दिल कि "अश्क़।
कैसे यकीं दिलाऊं कि हम भी, दाग -ऐ -जिग़र रखते हैं।।