Saturday, November 9, 2013

ज़बान पे तल्ख़ी हाथ में, पत्थर रखते हैं।
उनके पहलू में हम जब भी, सर रखते हैं।।

जाने कब याद उनकी, दिल को रुला जाये।
आँखों को इसलिए आंसुओ से, तर रखते हैं।।

ढूढे नहीं मिला वो, हुजूम -ऐ -दहर में मुझको।
लोगों की नज़र में, हम भी नज़र रखते हैं।।

कितना ख़ुशनसीब होगा, जो करीब है उनके।
सुना है वो गेसुओं में, कौशर रखते हैं।।

सुनता नहीं है आह कोई, इस दिल कि "अश्क़।
कैसे यकीं दिलाऊं कि हम भी, दाग -ऐ -जिग़र रखते हैं।।

Sunday, November 3, 2013

आँसुवों  से जलाकर चराग, इस दीवाली में।
उतारेंगे जमीं पे आफताब, इस दीवाली में।।

हसरत तो कतई नहीं है, पीने कि दिल में।
जायेंगे मगर क़दह -ए -शराब, इस दीवाली में।।

तेरे कदीम जख्मो से, उब चुके हैं काफिर।
किसी नए गम का करो इजाद, इस दीवाली में।।

ख्वाबों में शबो -सहर तो, अब भी होती है।
देखने को देख लेंगे और भी ख्वाब, इस दीवाली में।।

हम किसके दिल कि, धड़कन हैं "अश्क " जो।
दिखाएँ महफ़िल -ऐ -ख़ानाख़राब, इस दीवाली में।।