Tuesday, December 31, 2013

अदब का मक़ाम हो तबस्सुम की महफ़िल हो।
तरन्नुम से लबरेज़ यह नया साल हो।।

नूर हो हर कुंज में सिर्फ़ तुमसे ही यहां।
संदली सा रुख़ हो कभी शादमा ना हाल हो।।

ताबीर में बस वो हों जो तुम्हें अपने लगें।
ज़ीस्त में नाकाम ना तुम कभी हर हाल हो।।

सागर की मौजें भी तुम्हारे रूप की चोरी करें।
अफ्शू चले हर शख्स पर दिल ना कभी बेहाल हो।।

इस जहाँ की हर ख़ुशी क़दमों में तेरे ही गिरे।
दे रहा हूँ मैं दुआ कुछ इस तरह ये साल हो।। 

Sunday, December 29, 2013

हर कस्ती की किस्मत में, किनारा नहीं होता।
हर कली का उरूज़ पे, सितारा नहीं होता।।

धड़कना एक बार भी, तेरे नाम के बगैर।
मेरे नासाज़ दिल को, ग़वारा नहीं होता।।

जाने क्यों नीद आँखों से, दूर रहती है।
दर्द जिस दिन दिल, हमारा नहीं होता।।

यूँ ही टूट जाते हैं,  कितने शीशे महफ़िल में।
हर आबगीन को साकी का, सहारा नही होता।।

सारे फ़साद का मर्कज़ तो, कलियों का बांगपन है।
"अश्क़ " कोई भँवरा यूँ ही आवांरा नहीं होता।।

Sunday, December 22, 2013

कल तलक चेहरा जिनका, मेरी नजर से दूर था।
आज जब देखा उन्हें मैं, माँग में सिन्दूर था।।


इस कदर थे वो खड़े, जैसे कोई तस्बीर हो।
वो अदा वो बांकपन, ना ही वो शुरूर था।।

हसरत मेरी फिर भी थी, दिल में बसाने की उन्हें।
रोक लेता था मुझे जो, वो मेरा ज़मीर था।।

चाह कर भी मैं उसे, आवाज़ तक ना दे सका।
दिल ने उसे अपना यूँ तो, माना भी जरूर था।।

नसीब में मेरे लिखा है, बस यही उनका करम।
लोग कहते हैं "अश्क " हबीब मेरा मजबूर था।।


Friday, December 13, 2013

मुझे शिकवा नहीं उसकी बेवफाई पर।
हाँ ग़म है थोड़ा जुदाई पर।।

वो तो किसी और की अमानत थे ऐ दिल।
इल्जाम मत लगा यूँ शहनाई पर।।

मुबारक हो उन्हें वज्म -ए -रंगी का हुनर।
छोड़ दें मुझको मेरी तन्हाई पर।।

उन्हें कुछ दे नहीं सकता एक जां के सिवा।
क्या करूँ ये जेब मेरी तंग है मॅहगाई पर।।

कैद हो गई जो परवाज़ की दीवानी थी "अश्क़।
उस सैयाद की नाजुक सिनसाई पर।।

Sunday, December 1, 2013

रात की  बड़ी अजब सी कहानी है।
कहीं ख़ामोशी तो कहीं लहरों की रवानी है

टूटकर चाहा हमने उन्हें दोस्तों।
शायद यही मेरी नादानी है।

उनके चेहरे पे उफ़ की शिकन के लिए
अभी आँखों से और भी दरिया बहानी है।

चाँद है तारे हैँ हवा नहीं है।
फिर भी ये रात बड़ी तूफानी है।

मेरे जीने का कुछ तो भरम रखना `अश्क़ `
मयख़ाने में अभी और भी महफिलें सजानी हैं।।







Saturday, November 9, 2013

ज़बान पे तल्ख़ी हाथ में, पत्थर रखते हैं।
उनके पहलू में हम जब भी, सर रखते हैं।।

जाने कब याद उनकी, दिल को रुला जाये।
आँखों को इसलिए आंसुओ से, तर रखते हैं।।

ढूढे नहीं मिला वो, हुजूम -ऐ -दहर में मुझको।
लोगों की नज़र में, हम भी नज़र रखते हैं।।

कितना ख़ुशनसीब होगा, जो करीब है उनके।
सुना है वो गेसुओं में, कौशर रखते हैं।।

सुनता नहीं है आह कोई, इस दिल कि "अश्क़।
कैसे यकीं दिलाऊं कि हम भी, दाग -ऐ -जिग़र रखते हैं।।

Sunday, November 3, 2013

आँसुवों  से जलाकर चराग, इस दीवाली में।
उतारेंगे जमीं पे आफताब, इस दीवाली में।।

हसरत तो कतई नहीं है, पीने कि दिल में।
जायेंगे मगर क़दह -ए -शराब, इस दीवाली में।।

तेरे कदीम जख्मो से, उब चुके हैं काफिर।
किसी नए गम का करो इजाद, इस दीवाली में।।

ख्वाबों में शबो -सहर तो, अब भी होती है।
देखने को देख लेंगे और भी ख्वाब, इस दीवाली में।।

हम किसके दिल कि, धड़कन हैं "अश्क " जो।
दिखाएँ महफ़िल -ऐ -ख़ानाख़राब, इस दीवाली में।।

Saturday, October 26, 2013


कीदत की दीवारों में वो बात नहीं। 
दिवाली के दिए की अवकात नहीं।।

तीर -ऐ -नजर यूँ है जुदा उसका। 
हबा -ऐ -शुरूर में भी परवाज नहीं।।

ब भी करे सवाल तो सजदा किये हुए। 
माहो -अंजुम में ऐसा महताब नहीं।।

हतियातन हर कोई दीदार करता है। 
शेरो -नज्म की जहाँ में किताब नहीं।।

कीरें जबीं की नाजों में बढ़ी होंगी। 
"अश्क " किसी किस्मत की वो मोहताज नहीं।।

Monday, October 21, 2013

छू रही है उनको एहसास से, हर गजल मेरी।
देख लेती है खुद को नाज से, हर गजल मेरी।।

उतरो कभी तुम तह में, ऐ साकी -ए -मयखाना।।
बुनी है शबनम -ओ -शराब से, हर गजल मेरी।।

न लैला से न हीर से, न ताज से लिखी है।
लिखी है एक जिन्दा मुमताज से हर गजल मेरी।।

वो ख्वाब क्या जो ख्वाब से बस ख्वाब रह जाये।
बेहतर है "अश्क " उस ख्वाब से हर गजल मेरी।।