अकीदत की दीवारों में वो बात नहीं।
दिवाली के दिए की अवकात नहीं।।
तीर -ऐ -नजर यूँ है जुदा उसका।
शहबा -ऐ -शुरूर में भी परवाज नहीं।।
रब भी करे सवाल तो सजदा किये हुए।
माहो -अंजुम में ऐसा महताब नहीं।।
एहतियातन हर कोई दीदार करता है।
शेरो -नज्म की जहाँ में किताब नहीं।।
लकीरें जबीं की नाजों में बढ़ी होंगी।
"अश्क " किसी किस्मत की वो मोहताज नहीं।।
Kya baat Sir..
ReplyDeleteGod Bless u always..
Good one
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