Sunday, December 29, 2013

हर कस्ती की किस्मत में, किनारा नहीं होता।
हर कली का उरूज़ पे, सितारा नहीं होता।।

धड़कना एक बार भी, तेरे नाम के बगैर।
मेरे नासाज़ दिल को, ग़वारा नहीं होता।।

जाने क्यों नीद आँखों से, दूर रहती है।
दर्द जिस दिन दिल, हमारा नहीं होता।।

यूँ ही टूट जाते हैं,  कितने शीशे महफ़िल में।
हर आबगीन को साकी का, सहारा नही होता।।

सारे फ़साद का मर्कज़ तो, कलियों का बांगपन है।
"अश्क़ " कोई भँवरा यूँ ही आवांरा नहीं होता।।

2 comments:

  1. I have gone through with this blog and find so many poems are speechless and extremely very rare and good. Thanks a lot for such wonderful poems. I wish you all the best

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  2. Sir, tremendous....bada dard bhara hai

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