Thursday, February 11, 2016

वो तिलिस्म था कि, जुदा क़ोई अंन्दाज था।
आईना ख़रीद रहे थे, चेहरे पे नक़ाब था।।

होश लुटा बैठे, जब  ये बताया किसी ने।
वो शहर का, इकलौता ग़ुलाब था।।

आज़ फ़िर शैलाब आया, इन आँखों के रस्ते।
शहर वालों ने समझा कि, मौसम ख़राब था।।

फूल, ख़ुशबू, हवा, साँसे, रिश्ते सब कुछ।
जिन्दगी समझा जिसे , वो इक हबाब था।।

जब तलक वो  साथ था, वक़्त भी ठहरा रहा।
बदले हुए इस दौर में, वो दौर -ए -इन्क़लाब था।।

उसने वही पढ़ा, जो चेहरे पे देखा।
मेरा क़िरदार "अश्क " खुलुश-ए-क़िताब था।।

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