छू रही है उनको एहसास से, हर गजल मेरी।
देख लेती है खुद को नाज से, हर गजल मेरी।।
उतरो कभी तुम तह में, ऐ साकी -ए -मयखाना।।
बुनी है शबनम -ओ -शराब से, हर गजल मेरी।।
न लैला से न हीर से, न ताज से लिखी है।
लिखी है "एक जिन्दा मुमताज" से हर गजल मेरी।।
वो ख्वाब क्या जो ख्वाब से बस ख्वाब रह जाये।
बेहतर है "अश्क " उस ख्वाब से हर गजल मेरी।।
देख लेती है खुद को नाज से, हर गजल मेरी।।
उतरो कभी तुम तह में, ऐ साकी -ए -मयखाना।।
बुनी है शबनम -ओ -शराब से, हर गजल मेरी।।
न लैला से न हीर से, न ताज से लिखी है।
लिखी है "एक जिन्दा मुमताज" से हर गजल मेरी।।
वो ख्वाब क्या जो ख्वाब से बस ख्वाब रह जाये।
बेहतर है "अश्क " उस ख्वाब से हर गजल मेरी।।
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