ज़िन्दगी अपने हिस्से की, जी लिया हमने।
यही सोचकर आज फिर, पी लिया हमने।।
मौज़ू -ए- क़ज़ा को, कोई समझ ना सके।
होंठों को अपने इसलिए, सी लिया हमने।।
हर पत्थर को गुरूर था, खुदा होने का।
आबगीनो को, हारकर चुन लिया हमने।।
टूट कर चाहा जिसे, हर साँस के साथ।
मेरी वफ़ाओं को उँगलियों पर, गिन लिया उसने।।
हर शय को पता था, जिंदगी की बेवफ़ाई का।
वफ़ा-ए-क़ज़ा का "अश्क़" यूँ ही नहीं, दिल लिया हमने।।
यही सोचकर आज फिर, पी लिया हमने।।
मौज़ू -ए- क़ज़ा को, कोई समझ ना सके।
होंठों को अपने इसलिए, सी लिया हमने।।
हर पत्थर को गुरूर था, खुदा होने का।
आबगीनो को, हारकर चुन लिया हमने।।
टूट कर चाहा जिसे, हर साँस के साथ।
मेरी वफ़ाओं को उँगलियों पर, गिन लिया उसने।।
हर शय को पता था, जिंदगी की बेवफ़ाई का।
वफ़ा-ए-क़ज़ा का "अश्क़" यूँ ही नहीं, दिल लिया हमने।।
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